दोराहे पर देश!

– वेद प्रकाश शर्मा


आज देश फिर उसी दोराहे पर खड़ा है जैसे दोराहे पर वह 41 साल पूर्व खड़ा हुआ था। उस समय देश के मतदाताओं ने जो रास्ता चुना था उससे वह अल्पसमय में ही अपने को ठगा-सा महसूस करने लगा था। वर्ष 1977 की जनता पार्टी का जो हस्र हुआ था वह आज भी मतदाताओं के जेहन में है। विभिन्न विचारधारा के दलों के हितों-विचारों ने जब आपस में टकराना शुरू किया तब उनका वह एका चिन्दी-चिन्दी होकर हवा में उड़ता हुआ दिखाई दिया था। देश वही है, दल-पार्टियां भी वही हैं, एका की आवाजें भी लगभग वैसी ही हैं, लेकिन मतदाताओं की सोच अब वैसी नहीं है जो 41 साल पहले थी। कहावत है कि ‘दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है।Ó इतिहास गवाह है कि केन्द्र या राज्यों की संविद सरकारें एक-दो अपवादों को छोड़ कर एक तो अपना कार्यकाल पूरी नहीं कर सकीं, दूसरे ऐसी सरकारें जनता की कसौटी पर खरी नहीं उतरी हैं।

अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों में केन्द्र में सतारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को हराने के लिए विपक्षी दल एकजुट होकर पिछले कई महीनों से महागठबंधन खड़ा करने की कवायद में जुटे दिखाई दे रहे हैं। सभी दल ‘अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना रागÓ अलाप रहे हैं। जैसे-जैसे समय बीत रहा है, चुनावों का समय नजदीक आता जा रहा है, वैसे-वैसे महागठबंधन के सुर भी तेज होते जा रहे हैं। उन सुरों में तेजी तो है लेकिन कुछ गांठें ऐसी हैं जो महागठबंधन के गठन में आड़े आ रही हैं। उन गांठों को सुलझाना उनके सामने ‘टेढ़ी खीरÓ के समान होता जा रहा है। सभी दल अपने-अपने हितों को ध्यान में रख कर फूंक-फूंक कर कदम बढ़ा रहे हैं। इन गांठों में दो ऐसी हैं जिनको सुलझाना उनके लिए मुश्किल हो रहा है। इनमें पहली है सीटों का बंटवारा और दूसरी मजबूत गांठ है कि यदि ‘बिल्ली के भाग्य से छींका टूट जायÓ और चुनावों में जीत मिल जाय तो प्रधानमंत्री की कुर्सी किस दल के खाते में जाएगी और कौन उस पर विराजेगा? प्रधानमंत्री की कुर्सी की दावेदारी की दौड़ में फिलहाल तीन नाम सुनाई दे रहे हैं। बाद में इन नामों में कुछ और नाम जुड़ जाएं इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता। फिलहाल सहमति इस बात पर बनती दिख रही है कि प्रधानमंत्री का नाम’चुनाव बाद तय किया जाएगा।Ó फिलहाल तो इस मुद्दे को टाला जा सकता है। लेकिन चुनाव बाद यह समस्या खड़ी नहीं होगी, इस सम्भावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। प्रधानमंत्री पद को लेकर चुनाव बाद सहमति न बन सकी तब क्या होगा? यदि सहमति बन भी जाए लेकिन इस बात की क्या गारंटी होगी कि अपने मन में प्रधानमंत्री पद की महत्वाकांक्षा पाले अन्य लोगों की लालसा जाग उठेगी तब क्या होगा? ऐसे में प्रधानमंत्री की कुर्सी को हिलने-डुलने से कौन रोक सकेगा? यही सब तो हुआ था 41 साल पूर्व 1977 में बनी जनता पार्टी की सरकार में!
जनता पार्टी के गठन, सरकार के बनने और बिखरने का इतिहास जानने के लिए अतीत में झांक कर देखते हैं तो पता चलता है कि इमरजेंसी के बाद हुए साल 1977 के मार्च महीने में अधिकतर विपक्षी दलों ने एका करके कांग्रेस को पटखनी देकर केन्द्र में सरकार बनाई थी और सर्वसम्मति से श्री मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठाया गया था। लेकिन यह सर्वसम्मति अंत तक कायम नहीं रह सकी। प्रधानमंत्री की कुर्सी को लेकर ऐसी खींचतान मची कि एकजुट हुए विपक्षी दल छिटक कर अलग-थलग खड़े दिखाई देने लगे थे। उनका एका चिन्दी-चिन्दी बिखर कर एक-दूसरे को मुंह चिढ़ा रहा था। कांग्रेस-विरोध के नाम पर विपक्षी दलों ने देश की जनता को जिन सब्जबागों-दिवास्वप्नों को दिखा कर जनता पार्टी की सरकार बनाई थी वह आंतरिक कलह में उलझ कर प्रत्येक मोर्चे पर विफल दिखाई देने लगी थी। विकास के नाम पर देश को आपसी झगड़ों का उपहार प्राप्त हो रहा था। यह सब देख कर देश की जनता अपने को ठगा-ठगा सा महसूस करने लगी थी। उस समय तराजू के एक ही पलड़े पर ‘मेढकों को तौलनेÓ जैसी तमाम कोशिशें की गईं लेकिन वे बेकार साबित हुईं थीं। अंतत: अगस्त, 1979 में जनता पार्टी की सरकार का पतन हो गया। इसका कुपरिणाम यह हुआ कि दो-ढाई साल के भीतर देश को पुन: चुनावी-खर्च का भारी-भरकम बोझ वहन करना पड़ा था। इसके बाद जनवरी, 1980 में हुए आम चुनावों में कांग्रेस की एक बार फिर भारी बहुमत से सत्ता पर वापसी हुई थी।
आज देश की राजनीति में 41 साल बाद फिर वैसा ही होता दिखाई दे रहा है। फर्क सिर्फ दो हैं। पहला यह कि उस समय निशाने पर कांग्रेस थी, आज भाजपा है। दूसरा यह कि आज विपक्षी दलों में कांग्रेस भी शामिल है! लेकिन देश वही है, दल और पार्टियां भी वही और मतदाता भी वही हैं। कहावत है कि ‘दूध का जला छाछ भी फंूक-फूंक कर पीता हैÓ। साल 1977 में एका के नाम पर नाटक की जो स्क्रिप्ट लिखी गई थी वह मतदाताओं के सामने आज भी है। आज का मतदाता देश में ऐसा राजा नहीं चाहेगा जिसे छोटे से छोटा निर्णय लेने में भी दूसरों का मुंह ताकना पड़े। वह ऐसे राजा को सपोर्ट करने का मन बनाएगा जो सोच-समझ कर देशहित में दूरगामी निर्णय लेने की क्षमता रखता हो और अपने निर्णयों पर उनके पूरा होने तक अड़ा रहे; जिसमें आंख झुका कर नहीं, बल्कि आंख मिला कर बात करने की हिम्मत हो; जिसके हाथ भ्रष्टाचार, परिवारवाद, जातिवाद, भाई-भतीजावाद या और किसी देशविरोधी और समाजविरोधी अन्य वाद में न सने हों।
इतिहास गवाह है कि केन्द्र या राज्यों की संविद सरकारें एक-दो अपवादों को छोड़ कर अपना कार्यकाल पूरी नहीं कर सकीं हैं। संविद सरकारों का अधिकतर समय सहयोगी दलों की मान-मनौवल में ही खप जाता है, ऐसे में विकास कार्यों का ठप हो जाना स्वाभाविक है। घटक दलों के स्वहित के सामने जनहित हाशिये पर पड़े रह जाते हैं। परिणामत: ऐसी सरकारें जनता की उम्मीदों खरी नहीं उतर सकीं हैं। अधिकतर संविद सरकारों की नाकामयाबी इतिहास के पन्नों में दर्ज है।
यह भविष्य के गर्भ में है कि महागठबंधन आकार ले सकेगा या नहीं, आगामी लोकसभा चुनावों का ‘ऊंट किस करवट बैठेगाÓ; लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि आज का समय वह नहीं है जो 41 साल पहले था, न ही आज के मतदाता की वैसी समझ और सोच है। आज का मतदाता चाहे वह किसी भी आयुवर्ग का हो, समझदार-सतर्क है, वह अपना अच्छा-बुरा, हित-अनहित ठीक से समझता है।
अंत में फिलहाल यही कहा जा सकता है कि 41 साल बाद आज देश फिर ऐसे दोराहे पर खड़ा है जिसमें से उसे एक रास्ता चुनना है। वह रास्ता ऐसा होना चाहिए जो देश को ऊंचाइयों पर ले जाने वाला हो, देशवासियों के लिए जो फिक्रमंद हो। उम्मीद ऐसी की जानी चाहिए कि देश का समझदार मतदाता सरकार की बागडोर उसी को सौंपेगा जो देश को विकास, भ्रष्टाचार मुक्त, अमन-चैन के रास्ते पर तो ले ही जाए, जो देश में विष घोलने वाली तमाम भ्रांतियों को मिटाने का भी माद्दा रखता हो। कहा भी गया है कि ‘काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती।Ó एक फिल्मीगीत के बोल याद आ रहे हैं- ‘यह पब्लिक है सब जानती है, पब्लिक है…।

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